प्रकृति सेवा मूलक भारतीय पर्यावरण चिंतन : विश्व के सतत भविष्य का सनातन मार्ग
लेखक — डॉ. अनिल मेहता
जब पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, जैव विविधता के क्षरण, प्रदूषण, जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं जैसी अभूतपूर्व चुनौतियों से जूझ रहा है, तब मानव सभ्यता एक ऐसे विकास मॉडल की तलाश कर रही है जो प्रकृति और प्रगति के बीच संतुलन स्थापित कर सके। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (Sustainable Development Goals) हों या “नेचर बेस्ड सॉल्यूशन्स” की अवधारणा, आज विश्व जिस दिशा में समाधान खोज रहा है, भारतीय संस्कृति ने उस जीवन-दर्शन को हजारों वर्ष पूर्व ही व्यवहार में उतार दिया था।
भारतीय पर्यावरण चिंतन का मूल मंत्र है—प्रकृति पर अधिकार नहीं, प्रकृति के साथ आत्मीय सहअस्तित्व। यहाँ पर्यावरण संरक्षण कोई अलग विषय नहीं, बल्कि धर्म, संस्कृति, सामाजिक जीवन और नैतिक आचरण का आधार है। भारतीय परंपरा प्रकृति को केवल संसाधन नहीं मानती, बल्कि उसे जीवनदायिनी चेतना के रूप में स्वीकार करती है। यही कारण है कि यहाँ पृथ्वी माता है, नदियाँ मातृस्वरूप हैं, पर्वत देवस्वरूप हैं, वृक्षों में देवत्व का निवास माना गया है और समस्त सृष्टि को एक परिवार के रूप में देखा गया है।
अथर्ववेद का मंत्र—
“माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः”
मानव और प्रकृति के इस आत्मीय संबंध की घोषणा करता है। पृथ्वी केवल भूमि नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जब मनुष्य स्वयं को पृथ्वी का पुत्र मानता है, तब उसके प्रति शोषण नहीं, संरक्षण का भाव स्वतः उत्पन्न होता है।
भारतीय पर्यावरणीय दृष्टि केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि पूर्णतः व्यवहारिक भी रही है। हमारे धर्मशास्त्रों और आचारग्रंथों में सार्वजनिक स्वच्छता, जल संरक्षण तथा पर्यावरण संतुलन के स्पष्ट नियम निर्धारित किए गए थे।
“मार्गजलदेवालयनदीतीरादौ मलोत्सर्गो निषिद्धः।”
अर्थात मार्ग, जलाशय, देवालय और नदी तट जैसे सार्वजनिक एवं पवित्र स्थानों पर मल-मूत्र त्याग करना निषिद्ध है।
आगे निर्देश मिलता है—
“हस्तान्द्वादश संत्यज्य मूत्रं कुर्याद् बलाशयात्।
अवकाशे षोडश वा पुरीषे तु चतुर्गुणम्॥”
अर्थात जल स्रोतों और सार्वजनिक स्थानों से पर्याप्त दूरी बनाकर ही शौच या मूत्रत्याग करना चाहिए। यह केवल धार्मिक अनुशासन नहीं था, बल्कि जलजनित रोगों की रोकथाम, सार्वजनिक स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का वैज्ञानिक आधार था। जिस स्वच्छता अभियान को आधुनिक विश्व आज अपनाने का प्रयास कर रहा है, उसका बीज भारतीय परंपरा में सहस्रों वर्ष पूर्व बोया जा चुका था।
भारतीय संस्कृति में जैव विविधता संरक्षण जीवन-पद्धति का अंग था। पीपल, बरगद, नीम, तुलसी जैसे वृक्षों को पूजनीय बनाया गया। गाय, नाग, मोर, हाथी, बंदर, कुत्ता, चूहा और अनेक जीवों को देवी-देवताओं से जोड़ा गया। नदियों, पर्वतों, वनों और झीलों को तीर्थ का स्वरूप दिया गया। यह केवल धार्मिक आस्था नहीं थी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का ऐसा सामाजिक तंत्र था जिसने प्रकृति के प्रति सम्मान को जनमानस का संस्कार बना दिया।
भारतीय दर्शन का “वसुधैव कुटुम्बकम्” सिद्धांत संपूर्ण सृष्टि की परस्पर निर्भरता का उद्घोष करता है। आधुनिक पारिस्थितिकी विज्ञान (Ecology) भी यही बताता है कि प्रत्येक जीव, वनस्पति और प्राकृतिक तंत्र एक-दूसरे से जुड़े हैं। यदि किसी एक कड़ी को नष्ट किया जाए तो पूरा पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित होता है।
श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है—
“अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।”
अर्थात समस्त प्राणी अन्न से जीवित रहते हैं, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है और वर्षा प्रकृति के संतुलन पर आधारित होती है। यह श्लोक जलचक्र, कृषि और जीवन के बीच संबंध का अद्भुत वैज्ञानिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
भारतीय पर्यावरणीय दृष्टि का एक अत्यंत प्रेरक उदाहरण गंगा दशहरा है। सामान्यतः इसे धार्मिक पर्व के रूप में देखा जाता है, जबकि इसके पीछे गहरा पर्यावरणीय संदेश निहित है। गंगा अवतरण की कथा में भगवान शिव द्वारा गंगा के प्रचंड वेग को अपनी जटाओं में धारण करना वस्तुतः हिमालय, वनों, चट्टानों, मिट्टी और प्राकृतिक जल नियंत्रण प्रणाली का प्रतीकात्मक चित्रण है। आज जब अंधाधुंध वृक्ष कटान, नदी तटों पर अतिक्रमण और अवैज्ञानिक निर्माण के कारण बाढ़ और जल संकट बढ़ रहे हैं, तब यह कथा हमें प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण का संदेश देती है।
भारत की पारंपरिक जल संस्कृति भी विश्व के लिए अनुकरणीय रही है। गाँवों के तालाब, बावड़ियाँ, कुएँ, जोहड़ और झीलें केवल जल स्रोत नहीं थे, बल्कि भूजल पुनर्भरण, सामाजिक सहभागिता और स्थानीय पारिस्थितिकी के केंद्र थे। आज जब देश के अनेक भाग जल संकट से जूझ रहे हैं, तब इन पारंपरिक प्रणालियों का पुनर्जीवन अत्यंत आवश्यक हो गया है।
आज विश्व “सर्कुलर इकॉनॉमी” और “सस्टेनेबल लाइफस्टाइल” की चर्चा कर रहा है, जबकि भारतीय समाज सदियों से सीमित उपभोग, पुनर्चक्रण और संसाधनों के संतुलित उपयोग का पक्षधर रहा है।
ईशोपनिषद का संदेश—
“तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्।”
अर्थात आवश्यकता भर ही ग्रहण करो, लालच मत करो। यह केवल आध्यात्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि सतत विकास का मूल सिद्धांत है। उपभोक्तावाद के स्थान पर संयमित जीवन ही पृथ्वी के सीमित संसाधनों की रक्षा कर सकता है।
भारतीय दर्शन पंचमहाभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—को समस्त सृष्टि तथा मानव शरीर का आधार मानता है। यजुर्वेद का शांति मंत्र समूची प्रकृति के संतुलन की कामना करता है—
“ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिः। औषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिः…”
यह विश्व का संभवतः सबसे प्राचीन पर्यावरणीय घोषणापत्र है, जिसमें संपूर्ण प्रकृति के संतुलन को मानव कल्याण का आधार माना गया है।
भारतीय संविधान भी इसी सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाता है। अनुच्छेद 48(क) राज्य को पर्यावरण, वन और वन्यजीवों की रक्षा का दायित्व देता है, जबकि अनुच्छेद 51(क)(ग) प्रत्येक नागरिक का मूल कर्तव्य निर्धारित करता है कि वह प्राकृतिक पर्यावरण, वन, झील, नदी और वन्यजीवों की रक्षा करे तथा सभी जीवों के प्रति करुणा रखे। यह उल्लेखनीय है कि संविधान में निहित यह दृष्टि भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों का ही आधुनिक संवैधानिक रूप है।
आज आवश्यकता केवल पर्यावरण संरक्षण की चर्चा करने की नहीं, बल्कि उसे सामाजिक संस्कार बनाने की है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी को भारतीय पर्यावरणीय परंपराओं के वैज्ञानिक पक्ष को समझना होगा। गंगा दशहरा, वट सावित्री, छठ, वृक्ष पूजन, गोचर भूमि संरक्षण और जैव विविधता से जुड़े लोकपर्व पर्यावरणीय संतुलन के सांस्कृतिक मॉडल हैं। इन्हें अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण के जनआंदोलन के रूप में देखने की आवश्यकता है।
जल संरक्षण, प्लास्टिक मुक्त जीवन, जैविक खेती, स्थानीय उत्पादों का उपयोग, वर्षाजल संचयन, वृक्षारोपण, पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन तथा जनभागीदारी जैसे प्रयास तभी सफल होंगे, जब वे केवल सरकारी योजनाएँ न रहकर सामाजिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बन जाएँ।
यदि विश्व भारतीय जीवन-दर्शन की उस भावना को स्वीकार कर ले, जिसमें पृथ्वी माता है, नदियाँ जीवन हैं, वृक्ष देवतुल्य हैं और समस्त सृष्टि एक परिवार है, तो जलवायु संकट, प्रदूषण और पर्यावरणीय असंतुलन जैसी अनेक समस्याओं का समाधान सहज संभव हो सकता है। आज मानवता को नई तकनीक के साथ-साथ नई जीवन-दृष्टि की आवश्यकता है, और वह जीवन-दृष्टि भारतीय संस्कृति सदियों से संजोए हुए है।
वास्तव में, प्रकृति को जीतने की नहीं, उसकी सेवा करने की भारतीय भावना ही मानव सभ्यता को सुरक्षित, संतुलित और समृद्ध भविष्य प्रदान कर सकती है। यही भारतीय पर्यावरण चिंतन का शाश्वत संदेश है और यही विश्व के सतत भविष्य का सबसे विश्वसनीय मार्ग भी।
(लेखक पर्यावरणविद हैं)





