देखो माई, रथ बैठे जगदीश
भारतीय संस्कृति की लोकआस्था, समरसता और भक्ति का अद्भुत महापर्व
—कौशल मूंदड़ा—
भारतीय संस्कृति में उत्सव केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि लोकजीवन की आत्मा हैं। प्रत्येक पर्व अपने भीतर अध्यात्म, दर्शन, लोकपरंपरा और सांस्कृतिक चेतना का विराट स्वरूप समेटे हुए है। इन्हीं महोत्सवों में भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा विश्व की उन अद्वितीय धार्मिक परंपराओं में सम्मिलित है, जहाँ ईश्वर स्वयं अपने भक्तों के बीच आने का संदेश देते हैं। यही कारण है कि जब विशाल रथों पर आरूढ़ भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा नगर भ्रमण के लिए निकलते हैं, तब करोड़ों भक्तों के हृदय से सहज ही स्वर फूट पड़ता है—“देखो माई, रथ बैठे जगदीश।”
‘जगन्नाथ’ अर्थात सम्पूर्ण जगत के नाथ और ‘जगदीश’ अर्थात संसार के ईश्वर। उड़ीसा के पवित्र श्रीक्षेत्र पुरी में विराजमान भगवान जगन्नाथ केवल एक मंदिर के देवता नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के आराध्य हैं। उनकी महिमा इस बात में भी निहित है कि वे जाति, वर्ग, भाषा और सम्प्रदाय की सभी सीमाओं से परे लोकमंगल और सार्वभौमिक समरसता के प्रतीक हैं। उनके श्रीविग्रहों में नाम, स्वरूप और गुणों की अद्भुत एकता विद्यमान है। भगवान श्रीकृष्ण, बलभद्र और सुभद्रा के रूप में प्रतिष्ठित यह दिव्य त्रयी भारतीय भक्ति परंपरा का अनुपम वैभव है।
जगन्नाथ मंदिर की एक विशेष परंपरा विश्वभर में अद्वितीय मानी जाती है। यहाँ भगवान के श्रीविग्रह काष्ठ से निर्मित होते हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार जब बारह से उन्नीस वर्षों के अंतराल में अधिक आषाढ़ अर्थात पुरुषोत्तम मास का संयोग आता है, तब ‘नवकलेवर’ की दिव्य परंपरा के अंतर्गत अत्यंत गोपनीय वैदिक विधानों से नए विग्रहों का निर्माण कर उनकी प्रतिष्ठा की जाती है। यह केवल मूर्ति परिवर्तन नहीं, बल्कि सनातन दर्शन में जीवन, परिवर्तन और अनश्वर चेतना का गहन आध्यात्मिक संदेश है।
चूँकि विग्रह काष्ठ निर्मित हैं, इसलिए उनकी दैनिक सेवा भी विशिष्ट विधि से सम्पन्न होती है। प्रतिदिन बड़े दर्पणों पर जल का छिड़काव कर प्रतीकात्मक स्नान कराया जाता है। किंतु ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा को ‘स्नान यात्रा’ अथवा ‘ज्येष्ठाभिषेक’ के अवसर पर भगवान का सार्वजनिक महाअभिषेक सम्पन्न होता है। इस दिव्य स्नान के पश्चात मान्यता है कि भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और लगभग पंद्रह दिनों तक ‘अनवसर’ अथवा सांकेतिक विश्राम करते हैं। इस अवधि में भक्त प्रत्यक्ष दर्शन से वंचित रहते हैं और प्रभु के पुनः दर्शन की प्रतीक्षा स्वयं एक साधना बन जाती है।
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया का सूर्योदय होते ही यह प्रतीक्षा आनंदोत्सव में परिवर्तित हो जाती है। इसी दिन विश्वविख्यात श्रीजगन्नाथ रथयात्रा का शुभारंभ होता है। भारतीय संस्कृति में ‘यात्रा’ केवल स्थान परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नयन, लोकसंपर्क और धर्मप्रचार का माध्यम रही है। भगवान स्वयं जब रथ पर आरूढ़ होकर भक्तों के द्वार तक आते हैं, तब यह संदेश मिलता है कि ईश्वर किसी एक मंदिर की परिधि में सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के संरक्षक हैं।
पुरी में प्रतिवर्ष तीन विशाल काष्ठ निर्मित रथ तैयार किए जाते हैं। भगवान जगन्नाथ का ‘नंदीघोष’, बलभद्र का ‘तालध्वज’ और सुभद्रा का ‘दर्पदलन’ रथ अपनी विशिष्ट संरचना, रंग-विन्यास और प्रतीकों के कारण अद्वितीय माने जाते हैं। इन रथों का निर्माण अक्षय तृतीया से प्रारंभ होता है। इसके लिए चयनित वृक्षों से लेकर निर्माण की प्रत्येक प्रक्रिया वैदिक परंपराओं और धार्मिक अनुशासन के अनुसार सम्पन्न की जाती है। लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में जब इन रथों की रस्सियाँ खींची जाती हैं, तब ऐसा प्रतीत होता है मानो सम्पूर्ण मानवता एक ही सूत्र में बँध गई हो।
रथयात्रा का गंतव्य गुंडिचा मंदिर होता है, जहाँ भगवान लगभग एक सप्ताह विश्राम करते हैं। इसके पश्चात पुनः रथों पर आरूढ़ होकर अपने मुख्य मंदिर लौटते हैं। इस वापसी यात्रा को ‘बहुदा यात्रा’ कहा जाता है। इस संपूर्ण उत्सव में अनेक पारंपरिक अनुष्ठान सम्पन्न होते हैं, जिनमें ‘छेरा पहरा’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इस अनुष्ठान में पुरी के गजपति महाराज स्वर्णमंडित झाड़ू से भगवान के रथों के समक्ष मार्ग की सफाई करते हैं। यह दृश्य भारतीय संस्कृति के उस सनातन आदर्श को प्रत्यक्ष करता है कि ईश्वर के सम्मुख राजा और सामान्य जन सभी समान हैं। सत्ता का सर्वोच्च शिखर भी सेवा के भाव के आगे नतमस्तक हो जाता है।
ज्येष्ठ मास में सम्पन्न होने वाली ‘चंदन यात्रा’ भी भगवान जगन्नाथ की प्रमुख लीलाओं में सम्मिलित है। यह उत्सव ग्रीष्म ऋतु में भगवान को शीतलता प्रदान करने और भक्तों के प्रेमाभिषेक का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार भगवान की सेवा में ऋतु, प्रकृति और भक्ति का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
जगन्नाथ संस्कृति का प्रभाव केवल उड़ीसा तक सीमित नहीं है। गुजरात के अहमदाबाद से लेकर राजस्थान के उदयपुर तक यह परंपरा समान श्रद्धा के साथ जीवंत है। उदयपुर में आयड़ स्थित गंगेश्वर कुंड के इस्कॉन मंदिर, सेक्टर-7 स्थित जगन्नाथ मंदिर तथा ऐतिहासिक जगदीश चौक स्थित श्रीजगदीश मंदिर से भव्य रथयात्राएँ निकलती हैं। विशेष रूप से जगदीश चौक से निकलने वाली रजत रथयात्रा नगर की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है। भगवान जगन्नाथ अपने दिव्य स्वरूपों सहित रजत रथ में विराजमान होकर नगर भ्रमण करते हैं और हजारों श्रद्धालु दर्शन, सेवा तथा कीर्तन का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि लोकआस्था, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक एकता का उत्सव है।
राजस्थान की वैष्णव परंपरा में इस अवसर का एक और सांस्कृतिक आयाम है। रथयात्रा के साथ ही वर्षा ऋतु के स्वागत में राग मल्हार का गायन प्रारंभ हो जाता है। मंदिरों में भक्ति-संगीत की मधुर स्वर-लहरियाँ वातावरण को अलौकिक बना देती हैं। भारतीय संगीत और अध्यात्म का यह अद्वितीय संगम दर्शाता है कि यहाँ कला भी साधना का ही एक रूप है।
संस्कृतिविद मनोहरलाल मूंदड़ा बताते हैं कि जगन्नाथ परंपरा का प्रभाव पुष्टिमार्ग में भी स्पष्ट दिखाई देता है। महाप्रभु श्रीवल्लभाचार्य ने भगवान की सेवा में प्रतिदिन चावल के भोग की परंपरा को विशेष महत्व प्रदान किया। जगन्नाथ धाम में आज भी भगवान को प्रतिदिन चावल का महाभोग अर्पित किया जाता है। यद्यपि पुष्टिमार्ग में भी रथयात्रा उत्सव मनाया जाता है, किंतु उसका आयोजन तिथि के आधार पर न होकर पुष्य नक्षत्र के अनुसार सम्पन्न होता है। यह भारतीय धार्मिक परंपराओं की विविधता में निहित एकात्मता का सुंदर उदाहरण है।
वास्तव में श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा हमें यह संदेश देती है कि धर्म का सार केवल पूजा-अर्चना में नहीं, बल्कि सेवा, समरसता, समानता और लोककल्याण में निहित है। जब भगवान स्वयं रथ पर आरूढ़ होकर भक्तों के बीच आते हैं, तब वे यह प्रेरणा देते हैं कि ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग अहंकार से नहीं, विनम्रता, प्रेम और सेवा से प्रशस्त होता है।
इसलिए जब नगर की गलियों में रथ के पहिए आगे बढ़ते हैं, शंखनाद गूँजता है, मृदंग और झाँझ की ध्वनि वातावरण को भक्ति से भर देती है और लाखों कंठों से एक साथ स्वर उठता है—“देखो माई, रथ बैठे जगदीश”—तब वह केवल एक उद्घोष नहीं रहता, बल्कि भारतीय संस्कृति की सनातन चेतना, लोकविश्वास और ईश्वर के प्रति अटूट समर्पण का अमर घोष बन जाता है।





