नवीनतम संस्कृति एवं वैज्ञानिकता

जब अनाथ मास को मिला भगवान विष्णु का नाम तो बन गया पुरुषोत्तम मास

संदर्भ — 17 मई से शुरू हो रहा है अधिक मास

—कौशल मूंदड़ा—

भारतीय संस्कृति केवल पर्वों की संस्कृति नहीं है, यह समय को भी उत्सव में बदल देने वाली सभ्यता है। यहां ऋतुएं केवल मौसम नहीं, अनुभूति हैं। नक्षत्र केवल आकाशीय बिन्दु नहीं, जीवन के संकेत हैं, और मास केवल तिथियों का क्रम नहीं, बल्कि आत्मा के जागरण के अवसर हैं। इन्हीं अवसरों में एक अत्यन्त विशिष्ट और आध्यात्मिक महत्व का काल है — पुरुषोत्तम मास, जिसे अधिक मास भी कहा जाता है। इस बार 17 मई से अधिक मास शुरू हो रहा है। इस संवत् में ज्येष्ठ मास दो हैं।

यह मास भारतीय कालगणना की वह अद्भुत देन है जहां विज्ञान, दर्शन, धर्म और लोकजीवन एक साथ दिखाई देते हैं। यह केवल पंचांग का अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि भारतीय मनीषा की दूरदृष्टि और आध्यात्मिक संवेदना का जीवंत प्रतीक है।

पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार जब बारह महीनों का विभाजन हुआ, तब एक ऐसा मास रह गया जिसका कोई स्वामी नहीं था। वह उपेक्षित और अनाथ-सा हो गया। देवताओं ने भी उसे स्वीकार नहीं किया। तब वह मास भगवान विष्णु की शरण में पहुंचा। भगवान ने उसे अपने नाम से विभूषित कर कहा — “आज से तुम पुरुषोत्तम मास कहलाओगे।”

यही कारण है कि यह मास सीधे भगवान श्रीहरि को समर्पित माना गया। यह संदेश अत्यन्त गहरा है — जिसे संसार तिरस्कृत कर दे, उसे ईश्वर अपना लेते हैं। भारतीय संस्कृति का यह करुणा-दर्शन पुरुषोत्तम मास को केवल धार्मिक नहीं, मानवीय संवेदना का भी पर्व बना देता है।

प्राचीन कालगणना का अचूक प्रमाण

भारतीय ऋषि केवल तपस्वी नहीं थे, वे उच्चकोटि के गणितज्ञ और खगोलवेत्ता भी थे। उन्होंने सूर्य और चंद्रमा की गतियों का इतना सूक्ष्म अध्ययन किया कि हजारों वर्ष पहले ही समझ लिया था कि सौर वर्ष और चान्द्र वर्ष में अन्तर है।

सौर वर्ष लगभग 365 दिन 6 घंटे का होता है, जबकि चान्द्र वर्ष लगभग 354 दिनों का। इस प्रकार प्रतिवर्ष लगभग 11 दिनों का अन्तर उत्पन्न होता है। यदि इस अन्तर को संतुलित न किया जाए, तो हमारे पर्व ऋतुओं से विचलित हो जाएंगे। होली कभी शीत ऋतु में और दीपावली कभी वर्षा ऋतु में आने लगेगी। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए लगभग 32 मास 16 दिन के अंतराल पर एक अतिरिक्त चान्द्र मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।

यूं समझिये अधिक मास की गणना को

जब किसी एक चान्द्र मास के भीतर सूर्य किसी भी नई राशि में प्रवेश नहीं करता, अर्थात उस पूरे मास में कोई संक्रांति नहीं होती तब वह मास “अधिक मास” कहलाता है। अर्थात् जिस चान्द्र मास में एक भी संक्रांति न हो, वही अधिक मास होता है। संक्रांति उसे कहा जाता है जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है। जैसे — मेष राशि में प्रवेश — मेष संक्रांति या वृष राशि में प्रवेश — वृष संक्रांति। इस प्रकार सूर्य वर्ष भर में 12 राशियों में भ्रमण करता है और लगभग हर चान्द्र मास में एक संक्रांति होती है।

भारतीय पंचांग में एक चान्द्र मास अमावस्या से अमावस्या या पूर्णिमा से पूर्णिमा तक माना जाता है। इसकी अवधि लगभग 29.5 दिन होती है। जबकि सूर्य को एक राशि से दूसरी राशि में जाने में लगभग 30 से 31 दिन लगते हैं। यहीं से अंतर उत्पन्न होता है। उदाहरण के लिए एक अमावस्या हुई। उसके बाद अगली अमावस्या तक सूर्य उसी राशि में बना रहा। बीच में सूर्य ने राशि परिवर्तन नहीं किया। यानी उस चान्द्र मास में कोई संक्रांति नहीं हुई, तब वह मास “अधिक” घोषित किया जाता है।

मान लीजिए आषाढ़ अमावस्या से नया मास शुरू हुआ। पूरे महीने सूर्य मिथुन राशि में ही रहा।
अगली अमावस्या आने तक सूर्य कर्क राशि में प्रवेश नहीं कर पाया। तो यह “अधिक आषाढ़” कहलाएगा। इसके बाद अगला सामान्य आषाढ़ मास आएगा, जिसमें संक्रांति होगी। विशेष बात यह है कि सामान्य मास में एक संक्रांति अवश्य होती है।

लीप ईयर से भी अधिक सूक्ष्म गणना

यह व्यवस्था आधुनिक “लीप ईयर” की अवधारणा से भी अधिक सूक्ष्म और वैज्ञानिक है। भारतीय ज्ञान-परम्परा का यह अद्भुत उदाहरण सिद्ध करता है कि हमारे पूर्वजों ने केवल धर्म की नहीं, ब्रह्माण्ड की भी गहरी साधना की थी।

“आध्यात्मिक डिटॉक्स” का मास

पुरुषोत्तम मास केवल गणना का सुधार नहीं करता, यह मनुष्य के जीवन में भी संतुलन का संदेश देता है। आज का युग भागदौड़, उपभोग और निरंतर व्यस्तता का युग है। मनुष्य बाहर से सम्पन्न होते हुए भी भीतर से थका हुआ है। ऐसे समय में यह मास विराम लेने की प्रेरणा देता है।

इस काल में विवाह, गृहप्रवेश जैसे मांगलिक कार्य अपेक्षाकृत कम किए जाते हैं और ध्यान, जप, कथा, सत्संग, दान तथा आत्मचिन्तन को महत्व दिया जाता है। यह मानो जीवन की गति को कुछ क्षणों के लिए धीमा कर आत्मा की आवाज़ सुनने का अवसर है। आधुनिक भाषा में कहें तो यह “माइन्डफुलनेस”, “आध्यात्मिक डिटॉक्स” और “आत्म-रीसेट” का भारतीय स्वरूप है। पुरुषोत्तम मास में भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और सत्यनारायण की विशेष आराधना की जाती है। तुलसी-पूजन, गीता-पाठ, भागवत कथा, दान-पुण्य और हरिनाम-स्मरण का अत्यधिक महत्व माना गया है।

लोकमान्यता है कि इस मास में किया गया एक जप सामान्य दिनों के अनेक जपों के बराबर फल देता है। यह धारणा केवल धार्मिक विश्वास नहीं, बल्कि साधना के प्रति मनुष्य की आंतरिक निष्ठा को प्रोत्साहित करने का माध्यम भी है। गांव हों या शहर, आज भी अधिक मास के दौरान संध्याकालीन भजन, कथा-मण्डलियां और सामूहिक पूजा का वातावरण बनता है। इससे समाज में सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक संवाद दोनों मजबूत होते हैं। पुरुषोत्तम मास हमें स्मरण कराता है कि जीवन में जब भी असंतुलन आए, तब घबराना नहीं चाहिए। थोड़ा ठहरकर स्वयं को ईश्वर, प्रकृति और आत्मा से जोड़ लेना चाहिए। क्योंकि वही जुड़ाव मनुष्य को पुनः पूर्ण बनाता है। काल के अनन्त प्रवाह में यह मास एक दीपक की तरह है, जो हमें बाहर के संसार से भीतर के प्रकाश की ओर ले जाता है।

भारतीय ज्ञान परम्परा की जीवित धरोहर

आज जब पूरी दुनिया “इंडियन नॉलेज सिस्टम” यानी भारतीय ज्ञान प्रणाली की ओर आकर्षित हो रही है, तब अधिक मास जैसी परम्पराएं हमारे वैज्ञानिक और सांस्कृतिक वैभव का प्रमाण बनकर सामने आती हैं। आचार्य आर्यभट्ट, वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त जैसे महान विद्वानों ने जो कालगणना विकसित की, वह केवल खगोलशास्त्र नहीं थी — वह जीवन को ब्रह्माण्ड के साथ जोड़ने की कला थी। भारतीय परम्परा ने समय को यांत्रिक नहीं माना। यहां काल भी चेतना है, साधना है और उत्सव है। पुरुषोत्तम मास उसी चेतना का दिव्य विस्तार है।

मानव सभ्यता की सबसे बड़ी विशेषता यह नहीं कि वह समस्याएं देखती है, बल्कि यह कि वह उनके समाधान किस दृष्टि से करती है। भारतीय ऋषियों ने सूर्य और चंद्रमा की गति में अन्तर देखा, पर उसे संकट नहीं माना। उन्होंने उसे ईश्वर की उपासना और आत्मजागरण का अवसर बना दिया। यही भारतीयता है — जहां गणित भी भक्ति बन जाता है और विज्ञान भी संस्कृति का उत्सव।

————

Udaipur_Dialogue

About Author

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may also like

संस्कृति एवं वैज्ञानिकता

भक्ति, ज्ञान और साहित्य का उज्ज्वल संगम

There are many variations of passages of Lorem Ipsum available but the majority have suffered alteration in that some injected