जगन्नाथ के भात और जगत पसारे हाथ!
भारतीय सनातन परंपरा में प्रसाद केवल भोजन नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा और आशीर्वाद का प्रतीक माना गया है। इसी भाव को लोक में प्रचलित कहावत “जगन्नाथ के भात और जगत पसारे हाथ” अत्यंत सरलता से व्यक्त करती है। भगवान जगन्नाथ के श्रीधाम पुरी में तैयार होने वाले महाप्रसाद की महिमा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी अद्वितीय है।
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में खान-पान की परंपराएं स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विकसित हुई हैं। जहां गेहूं प्रधान क्षेत्र हैं, वहां रोटी मुख्य भोजन है, वहीं उड़ीसा में चावल की भरपूर उपज होने के कारण भात दैनिक भोजन के साथ-साथ भगवान जगन्नाथ के भोग का भी प्रमुख अंग है। यही कारण है कि पुरी में चावल से बने महाप्रसाद का विशेष महत्व है और वहां प्राचीन परंपरा के अनुसार एकादशी के दिन भी भगवान को भात का भोग अर्पित किया जाता है।
वैष्णव परंपरा में एक प्रसिद्ध प्रसंग महाप्रभु श्री वल्लभाचार्यजी से जुड़ा है। अपने भारत भ्रमण के दौरान वे जगन्नाथ पुरी पहुंचे। संयोग से जिस दिन उन्हें भगवान जगन्नाथ का भात प्रसाद प्राप्त हुआ, उस दिन एकादशी का व्रत था। धर्मसंकट यह था कि न तो एकादशी का व्रत भंग करना उचित था और न ही भगवान के प्रसाद का अनादर। महाप्रभु ने अत्यंत सूझबूझ से प्रसाद को हाथ में धारण किया और उसके आध्यात्मिक महत्व का वर्णन करते रहे। जब तक उनका प्रवचन समाप्त हुआ, तिथि परिवर्तन होकर द्वादशी आरंभ हो चुकी थी। तब उन्होंने श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया।
कहा जाता है कि इस घटना के पश्चात महाप्रभु वल्लभाचार्यजी ने जगन्नाथ परंपरा की तीन विशेषताओं—एकादशी की विशिष्ट मान्यता, दैनिक भात के भोग तथा रथयात्रा महोत्सव—को पुष्टिमार्ग में सम्मानपूर्वक स्वीकार किया। इसी कारण पुष्टिमार्ग में भगवान का भात प्रसाद सामान्य अन्न नहीं, बल्कि दिव्य प्रसाद माना जाता है।
प्रसाद की महिमा को लेकर एक और प्रेरक कथा प्रचलित है। एक बार ठाकुरजी के भोग के बाद कुछ चावल के दाने मार्ग में बिखर गए। पीछे आ रहे एक गोस्वामी ने उन्हें श्रद्धापूर्वक उठाकर ग्रहण कर लिया। जब लोगों ने प्रश्न किया कि उन्होंने सखड़ी प्रसाद कैसे ग्रहण कर लिया, तो उनका उत्तर था—”मैंने अन्न नहीं, भगवान का प्रसाद ग्रहण किया है।” जनश्रुति के अनुसार बाद में उन चावल के दाने स्वर्ण के दानों के रूप में प्रकट हुए। यह कथा इस सत्य का प्रतीक है कि श्रद्धा से ग्रहण किया गया प्रसाद साधारण पदार्थ नहीं रहता, वह ईश्वर की कृपा का माध्यम बन जाता है।
प्रसाद का सम्मान करना हमारी संस्कृति का अभिन्न संस्कार है। उसमें मात्रा नहीं, भावना का महत्व है। श्रद्धा और कृतज्ञता के साथ ग्रहण किया गया प्रसाद मन में सकारात्मकता, संतोष और आध्यात्मिक शांति का संचार करता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में प्रसाद को कभी साधारण भोजन नहीं, बल्कि परमात्मा के स्नेह और अनुग्रह का स्वरूप माना गया है।
लेखक — मनोहरलाल मूंदड़ा, संस्कृतिविद





