उदयपुर की गलियों में बजती है माटी की धड़कन
राजस्थान की आत्मा का जीवंत दर्पण — विरासत फोक डांस एवं पपेट शो
जब शाम की लालिमा झीलों के जल में घुलने लगती है, जब अरावली की पहाड़ियाँ सोने की चादर ओढ़ लेती हैं, तब उदयपुर के जगदीश चौक पर एक अनोखा जादू जाग उठता है। ढोल की थाप, घुँघरुओं की रुनझुन और रंग-बिरंगे परिधानों की लहर — यह किसी सपने का दृश्य नहीं, यह है विरासत फोक डांस एवं पपेट शो — राजस्थान की माटी की वह अनुभूति, जो मन को छू लेती है, आत्मा को झकझोर देती है और स्मृतियों में सदा के लिए बस जाती है।
यह महज एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं है। यह एक यात्रा है — उस राजस्थान की यात्रा, जो किताबों में नहीं मिलता, जो किले-महलों की दीवारों में कैद नहीं होता, जो रेत के धोरों से परे, मानव-हृदय की गहराइयों में बसता है। यहाँ आकर दर्शक केवल नृत्य नहीं देखते — वे राजस्थान को जीते हैं।
एक साधारण बालिका का असाधारण संकल्प
इस सपने को हकीकत में उतारने वाली हैं विजयलक्ष्मी आमेटा — उदयपुर की वह बेटी, जिसे लोग अब प्यार से ‘गुलाबो’ भी कहने लगे हैं, एक साधारण परिवार में जन्मी, आर्थिक संघर्षों के बीच पली-बढ़ी, किन्तु नृत्य की धुन ऐसी लगी कि जीवन की हर कठिनाई छोटी पड़ गई। मात्र पाँच वर्ष की आयु में ही उन्होंने मन में ठान लिया था — नृत्य ही जीवन है, नृत्य ही साधना है। जब पिता के पास साधन न थे, तो वे साइकिल पर बैठकर मीलों दूर कार्यशालाओं तक पहुँचती थीं। कभी फीस न भर पाने की पीड़ा हुई, तो सरकारी संस्थाओं की निःशुल्क कार्यशालाओं ने उनकी राह आसान की।
घर में पाँच बहनों की सबसे बड़ी विजयलक्ष्मी ने जिम्मेदारियों और सपनों के बीच अद्भुत संतुलन साधा। स्कूल की पढ़ाई, घर के काम और नृत्य का अभ्यास — तीनों को उन्होंने बिना शिकायत निभाया। और मात्र बारह वर्ष की आयु में वे कोरियोग्राफी की राह पर चल पड़ीं — उस उम्र में, जब बच्चे खेलकूद में मगन रहते हैं।
गुरु की कृपा और लोक कला का वरदान
1992 में जब प्रसिद्ध रंग निर्देशक भानु भारती ने राष्ट्रीय नाट्य कार्यशाला का आयोजन किया, तब विजयलक्ष्मी को मंचीय अभिनय, नृत्य और नाट्यकला के गुर सीखने का अवसर मिला। भानु भारती ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें भारतीय लोक कला मंडल में लोक कलाकार के रूप में नियुक्त किया। यहीं से उनके जीवन की वह यात्रा शुरू हुई, जो उदयपुर से निकलकर छह से अधिक देशों तक पहुँची।
ब्रिटेन के ग्लासगो मेले में राजस्थानी लोकनृत्य की प्रस्तुति, 2003 के एशियाई खेलों में राजस्थान टीम की कोरियोग्राफी, 2004 से 2017 तक फ्रांस के अंतरराष्ट्रीय चिल्ड्रन फेस्टिवल में भागीदारी — विजयलक्ष्मी का नाम राजस्थानी लोककला का पर्याय बन गया।
विरासत — जहाँ पर्यटक घूमते हैं पूरा राजस्थान
जगदीश चौक की उस पवित्र धरती पर आज जो विरासत शो प्रतिदिन प्रस्तुत होता है, वह केवल मनोरंजन नहीं — वह राजस्थान की सांस्कृतिक आत्मा का जीवंत दर्पण है। घूमर, भवई, चरी, तेरहताल — ये केवल नृत्य नहीं हैं; ये सदियों की परंपरा हैं, पीढ़ियों का संचित ज्ञान है, राजस्थान की स्त्री-शक्ति का उद्घोष है।
और कठपुतली! वह रंगीन-धागों से बँधी काठ की गुड़िया, जो जब नाचती है तो मानो बोलने लगती है — राजाओं की कहानियाँ, प्रेम की पीड़ा, वीरता के गीत। विरासत की कठपुतली विद्या ने विदेशी दर्शकों को भी मंत्रमुग्ध किया है।
हर शाम देश-विदेश से आए सैकड़ों पर्यटक इस मंच पर जुटते हैं। और जब शो खत्म होता है, तो कई दर्शकों के मुख से अनायास निकल पड़ता है — “हमने पूरा राजस्थान घूमा, लेकिन जो मजा इस मंच की प्रस्तुति में आया, वह कहीं नहीं आया।” यह एक वाक्य विरासत की सबसे बड़ी उपलब्धि है, सबसे बड़ा पुरस्कार है।
संघर्ष जो मिटा न सके जज्बा
तीन वर्षों की इस यात्रा में संघर्ष कम नहीं रहे। कोरोना महामारी ने जब सब कुछ थाम दिया, तब भी विजयलक्ष्मी रुकी नहीं। उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से बच्चों को निःशुल्क प्रशिक्षण दिया और नई पीढ़ी में लोकनृत्य के प्रति रुचि और गहरी की। इस जज्बे का ही परिणाम है कि आज चिली दूतावास से आई कलाकारों ने यहाँ आकर राजस्थानी लोकनृत्य सीखा। जापान की प्रसिद्ध कला नेत्री ने विरासत का शो देखकर स्वयं चरी नृत्य सीखने की इच्छा जताई। यह राजस्थान की सांस्कृतिक शक्ति का वैश्विक अभिनंदन है।
हर रविवार को निःशुल्क प्रशिक्षण शिविर के माध्यम से उदयपुर की बेटियाँ और महिलाएँ अपनी जड़ों से जुड़ रही हैं। वे न केवल नृत्य सीख रही हैं — वे अपनी पहचान, अपनी विरासत और अपना गौरव वापस पा रही हैं।
उदयपुर आएँ — और विरासत को जीएँ
प्रिय पर्यटक, उदयपुर आपका स्वागत करता है — झीलों से, महलों से, हवेलियों से। किन्तु यदि आप सच में इस शहर की आत्मा को छूना चाहते हैं, तो एक शाम जगदीश चौक पर आइए। ढोल की थाप पर थिरकती उन काया को देखिए, जिनमें सदियों की साधना है। उन धागों में बँधी कठपुतलियों को देखिए, जो आपसे बिना बोले बहुत कुछ कह जाती हैं।
विरासत केवल एक शो का नाम नहीं — यह उस मिट्टी का आमंत्रण है, जिसने वीरों को जन्म दिया, जिसने प्रेम की गाथाएँ रचीं, जिसने रंग और संगीत को जीवन का पर्याय बनाया।
एक बार आइए — और मन में बसाकर ले जाइए पूरा राजस्थान।
“संघर्ष जब हौसले से टकराता है, तो एक कहानी जन्म लेती है।” विजयलक्ष्मी आमेटा की कहानी उदयपुर की पहचान है — और विरासत उस पहचान का उत्सव।




