भक्ति, ज्ञान और साहित्य का उज्ज्वल संगम
भारतीय संस्कृति में संत, कवि और दार्शनिकों की परंपरा सदैव समाज को मार्गदर्शन देती रही है। वैशाख शुक्ल पंचमी का दिन इसी परंपरा के दो महान प्रकाशस्तंभों की स्मृति से आलोकित है—भक्ति काव्य के महान कवि सूरदास और अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक जगद्गुरु आदि शंकराचार्य।
महाकवि सूरदास का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी को माना जाता है। हिंदी साहित्य में सूरदास नाम के कई कवियों का उल्लेख मिलता है, परंतु जिनकी जयंती आज मनाई जाती है वे बिल्वमंगल सूरदास के नाम से विख्यात हैं। उनकी रचनाओं में भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं, वात्सल्य और प्रेम का अद्भुत चित्रण मिलता है। उनकी अमर कृति सूरसागर भक्ति साहित्य की अमूल्य धरोहर है। हिंदी साहित्य जगत में सूरदास को सूर्य के समान तेजस्वी माना गया है, जबकि तुलसीदास को चंद्रमा की उपमा दी गई है। इस भाव को प्रसिद्ध पंक्तियों में व्यक्त किया गया है—
“सूर सूर तुलसी शशि, उडगन केशव दास।
अब के कवि खद्योत सम, जहं तहं करत प्रकाश।।”
इसी दिन अद्वैत दर्शन के महान आचार्य आदि शंकराचार्य की जयंती भी मनाई जाती है। उन्होंने भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक एकता को सुदृढ़ करने के लिए देश की चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठ—श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी और ज्योतिर्मठ—की स्थापना की। उनके द्वारा प्रतिपादित अद्वैत वेदांत ने यह संदेश दिया कि ब्रह्म ही सत्य है और समस्त सृष्टि उसी का स्वरूप है।
इस प्रकार यह दिन भक्ति, ज्ञान और संस्कृति के समन्वय का प्रतीक है। सूरदास की भक्ति और शंकराचार्य के दर्शन हमें यह प्रेरणा देते हैं कि साहित्य, आध्यात्म और संस्कृति के माध्यम से समाज को प्रकाशमान बनाया जा सकता है। यही भारतीय परंपरा की वास्तविक शक्ति और गौरव है।
जय भारत।
(मनोहर लाल मूंदड़ा)





